कथा-पाठ के ब्लॉग 'कॉफी-हाउस' का आग़ाज़ 9 जून को किया गया था। यानी तब से तकरीबन सोलह हफ्ते हो गये, हम हर सप्ताह एक कहानी के पाठ के साथ आपके सामने हाजि़र हो रहे हैं। ये याद करने की वजह है...'कॉफी-हाउस' का आग़ाज़महादेवी वर्मा की रचना 'गिल्लू' से किया गया था। एक दिन कथाकार मित्र पंकज सुबीर ने उन्हीं दिनों कहा था कि यहां कभी 'सोना हिरणा' भी सुनवाई जाए। इसलिए आज 'कॉफ़ी-हाउस' पर महादेवी वर्मा की रचना 'सोना हिरणा' पेश की जा रही है।
महादेवी की पुस्तक 'मेरा परिवार' के ये संस्मरण बेहद मार्मिक हैं। और 'कॉफ़ी-हाउस' में हमारा मन है कि धीरे-धीरे इस पूरी पुस्तक को ऑडियो रूप में प्रस्तुत कर दिया जाए।
आने वाले दिनों में 'कॉफी-हाउस' में आपको कई पीढियों के कथाकारों की रचनाएं सुनायी पड़ेंगी। हर्ष का विषय है कि लगभग सभी रचनाकार खुले हृदय से हमें अपनी रचनाएं पढ़ने की सहमति दे रहे हैं। सबका आभार।
'सोना हिरणा' को सुनने के लिए आपको अपने व्यस्त जीवन में से तकरीबन इक्कीस मिनिट निकालने होंगे। तो चलिए सुनते हैं ये रचना।
डाउनलोड का तरीक़ा जानने के लिए ये ट्यूटोरियल देखें। तो अब 'कॉफी-हाउस में मुलाक़ात होगी अगले सप्ताह एक नयी कहानी के साथ। हमेशा की तरह अब तक की कहानियों की सूची-
'कॉफी हाउस' में हर रविवार एक कहानी का वाचन लेकर हाजिर होते हैं। हमारा प्रयास है कि हम हर दौर की कहानियों का पाठ करें। और उन्हें डाउनलोड के लिए उपलब्ध करवाएं। ताकि आप उन्हें घर-परिवार या मित्रों-आत्मीयों के साथ सुन सकें। साझा कर सकें। इस बार हम लेकर आए हैं अज्ञेय की कहानी 'गैंगरीन'। इसे सुनने के लिए आपको अपनी व्यस्त दिनचर्या में से तकरीबन तेईस मिनिट निकालने होंगे।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' को हममें से ज्यादातर लोग
'शेखर, एक जीवनी' के रचनाकार के रूप में जानते हैं। कविताओं की उनकी दुनिया भी अद्भुत रही है। अज्ञेय को सन 1964 में 'आंगन के पार द्वार' काव्य-संग्रह के लिए 'साहित्य अकादमी' पुरस्कार दिया गया था। सन 1979 में उन्हें 'कितनी नावों पर कितनी बार' के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया था। यू-ट्यूब पर अज्ञेय पर एक वृत्तचित्र मौजूद है। यहां देखिए। तो चलिए 'कॉफी हाउस' में आज सुनें 'अज्ञेय' की कहानी 'गैंगरीन'।
'कॉफी-हाउस' में हम हर हफ्ते एक कहानी लेकर हाजिर होते हैं। जैसा कि हमने हमेशा कहते हैं कि हम हर दौर की कहानियां पढ़ना चाहते हैं। 'कथा-पाठ' का मक़सद यही है कि कहानियों को 'सुनने' का सिलसिला शुरू हो।
इस बार 'कॉफी-हाउस' में प्रस्तुत है प्रत्यक्षा की कहानी 'बलमवा तुम क्या जानो प्रीत'।
प्रत्यक्षा से आप भली-भांति परिचित हैं। उनके दो कहानी संग्रह हैं--'पहर दोपहर ठुमरी' और 'जंगल का जादू तिल तिल'। प्रत्यक्षा का ब्लॉगयहां पढ़ा जा सकता है। प्रत्यक्षा कविता और कहानियों की दुनिया की मुसाफिर हैं। उनके पास कहानी कहने का अपना एक मुहावरा है। उनकी कहानी में भी कविताई की छाप है। उनकी भाषा बड़ी ध्वन्यात्मक है। खनकती हुई-सी। ज़ाहिर है कि 'कॉफी-हाउस' में उन्हें सुनकर आपको आनंद आयेगा। हम शुक्रगुज़ार हैं कि उन्होंने अपनी कहानी 'कॉफी-हाउस' के लिए दी।
इस कहानी को सुनने के लिए आपको अपने व्यस्त जीवन में से तकरीबन बारह मिनिट निकालने होंगे।
डाउनलोड कड़ी एक डाउनलोडकड़ी दो कुछ मित्रों को कहानियां डाउनलोड करने में समस्या आ रही है। उनके लिए हमने एक पेज पर tutorial तैयार किया है। उसे देखने के लिएयहां क्लिक करें।
हमेशा की तरह अब तक की कहानियों की सूची-
महादेवी वर्मा की रचना--'गिल्लू'
भीष्म साहनी की कहानी--'चीफ़
की दावत'
मन्नू भंडारी की कहानी-'सयानी
बुआ'
एंतोन चेखव की कहानी- 'एक छोटा-सा
मज़ाक़'
सियाराम शरण गुप्त की कहानी-- 'काकी'
हरिशंकर परसाई की रचना--'चिरऊ
महाराज'
सुधा अरोड़ा की कहानी--'एक औरत
तीन बटा चार'
सत्यजीत रे की कहानी--'सहपाठी'
जयशंकर प्रसाद की कहानी--'ममता'
दो बाल कहानियां--बड़े भैया के स्वर
में
उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’
अमरकांत की कहानी 'दोपहर
का भोजन'
ओ. हेनरी की कहानी 'आखिरी
पत्ता'
लू शुन की कहानी ‘आखिरी बातचीत'
तो अब मिलते हैं अगले रविवार। एक नयी कहानी के पाठ के साथ।
'कॉफी हाउस' का मक़सद है जीवन में कहवा और कहानियों का संयोजन तैयार करना। जितनी देर में आप एक कॉफ़ी पीते हैं--उतने देर में एक कहानी भी सुनें। इसलिए तो हर रविवार हम लेकर आते हैं अपनी एक नयी प्रस्तुति।
लू-शुन को चीन का प्रेमचंद कहा जाता है। ज़रा दोनों की समानताएं देखिए। लू शुन (1881-1936) प्रेमचंद (1880-1936)
1936 में दोनों की मृत्यु एक ही महीने यानी अक्तूबर में हुई थी। लू शुन 19 अक्टूबर। प्रेमचंद 8 अक्टूबर।
दोनों की तस्वीरें देखिए।
'कॉफी-हाउस' में हमने अब तक ना तो प्रेमचंद को पढ़ा और ना ही लू-शुन को। साफ़ है कि 'कॉफी-हाउस' अभी अपने शैशव में है। और धीरे-धीरे हम इन दोनों महान कहानीकारों की कहानियां पढ़ेंगे। आज लू-शुन की कहानी सुनिए। इस कहानी को सुनने के लिए आपको अपने व्यस्त जीवन से केवल दो मिनिट सैंतीस सेकेन्ड ही निकालने होंगे।
Story : Aakhiri baatcheet.
Writer: Lu Xun Voice: Yunus Khan
Duration: 2 37
कथा-पाठ के ब्लॉग 'कॉफी-हाउस' के ज़रिये हम देश-विदेश की कहानियों को 'ऑडियो-रूप' में उपलब्ध करवा रहे हैं। हमने हमेशा कहा है कि ये कहानियां डाउनलोड करके अपने परिचितों और आत्मीयों के बीच बांटी जा सकती हैं। ख़ास मौक़ों पर उपहार में दी जा सकती हैं। इन्हें बच्चों को सुनवाया जा सकता है। और शायद कहानियों में उनकी दिलचस्पी पैदा की जा सकती है।
इस बार 'कॉफी-हाउस' में हम जिस कहानीकार की कहानी लेकर आए हैं--उसके चाहने वालों की तादाद हमेशा ख़ूब-ख़ूब रही है। देश-विदेश के फिल्मकारों ने उनकी कहानियों से प्रेरणा ली। तमाम भाषाओं में उनके अनुवाद हुए। ओ.हेनरी आज 'कॉफी-हाउस' में पहली बार आ रहे हैं। पर हमारा इरादा है कि उनकी बहुत सारी कहानियां यहां पढ़ी जायें। (तस्वीर साभार: इस साइट से)।
कहानियों के संदर्भ में ओ. हेनरी का ये कथन ग़ौर करने लायक़ है: “I'll give you the whole secret to short story writing. Here it is. Rule 1: Write stories that please yourself. There is no Rule 2.”
इस बार पेश है ओ. हेनरी की कहानी--'आखिरी पत्ता'। इसे सुनने के लिए आपको अपनी व्यस्त जिंदगी में से तकरीबन बीस मिनिट निकालने होंगे।
Story: Aakhiri Patta Translation of Origional Story: "The Last Leaf" Writer: O. Henry Voice: Mamta Singh Duration: 20 03
एक और प्लेयर ताकि सनद रहे
हमेशा की तरह ये बताना चाहेंगे कि इस कहानी को डाउनलोड किया जा सकता है। कोई दिक्कत हो तो बेहिचक बतायें। डाउनलोड कड़ी एक
'कॉफी-हाउस' में हर रविवार कथा-पाठ का सिलसिला जारी है। हमारा मक़सद है कि हम कथा-पाठ का एक ख़ज़ाना तैयार करें। और घर-परिवारों में इन्हें सुनने की परंपरा स्थापित हो। पिछले सप्ताह जब मनीष ने बताया कि उन्होंने सपरिवार कहानी 'वापसी' सुनी....तो बहुत अच्छा लगा। हम ये मानकर चल रहे हैं कि आप इन कहानियों को डाउनलोड करेंगे। और अपने आत्मीयों में बांटेंगे। इनका प्रसार करेंगे। और हां...आप हमें कोई ऐसी कालजयी कहानी भी सुझा सकते हैं--जिसे आप 'कॉफी-हाउस' में सुनना चाहें।
इस बार हम लेकर आए हैं अमरकांत की कहानी 'दोपहर का भोजन'।
अमरकांत ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित रचनाकार हैं। विकिपीडिया पर पता चला कि यशपाल उन्हें 'गोर्की' कहा करते थे। रचनात्मकता की दृष्टि से अमरकांत को 'गोर्की' के समकक्ष बताते हुए यशपाल ने लिखा था --'क्या केवल आयु कम होने या हिंदी में प्रकाशित होने के कारण ही अमरकांत गोर्की की तुलना में कम संगत मान लिए जायें। जब मैंने अमरकांत को गोर्की कहा था, उस समय मेरी स्मृति में गोर्की की कहानी 'शरद की रात' थी। उस कहानी ने एक साधनहीन व्यक्ति की परिस्थितियां और उन्हें पैदा करने वाले कारणों के प्रति जिस आक्रोश का अनुभव मुझे दिया था, उसके मिलते-जुलते रूप मुझे अमरकांत की कहानियों में दिखाई दिये।' बहरहाल.. आपको बता दें कि इस कहानी को सुनने के लिए आपको अपने व्यस्त जीवन से तकरीबन सोलह मिनिट निकालने होंगे।
हमेशा की तरह ये बताना चाहेंगे कि इस कहानी को डाउनलोड किया जा सकता है। कोई दिक्कत हो तो बेहिचक बतायें। डाउनलोड कड़ी एक। डाउनलोड कड़ी दो।
'कॉफी-हाउस' में आप ये कहानियां भी सुन सकते हैं। अर्चना जी की राय है कि हर कहानी लिंक के साथ दी जाए। दरअसल अब तक पढ़ी कहानियों तक 'बक्सा कहानियों का' और 'categories' खंड से पहुंचा जा सकता है। हमेशा की तरह अब तक की कहानियों की सूची:
'कथा-पाठ' के ब्लॉग 'कॉफी-हाउस' में हर रविवार को हम एक नयी कहानी लेकर प्रस्तुत होते हैं।
कथा-पाठ की इस यात्रा को हम कहानियों की विविधताओं के ज़रिये नये आयाम देना चाहते हैं।
लेकिन कथा-पाठ का सफ़र धीमा और ठोस हो तो अच्छा रहेगा।
इस बार हम लेकर आये हैं वरिष्ठ लेखिका उषा प्रियंवदा की कहानी-'वापसी' उषा जी को हम ख़ासतौर पर 'पचपन खंभे लाल दीवारें', 'शेष यात्रा' और 'रूकोगी नहीं राधिका' की रचनाकार के तौर पर जानते हैं। 'वापसी' उनकी बेहद महत्वपूर्ण कहानी है।
इसे सुनने के लिए आपको अपने व्यस्त जीवन में से तकरीबन बाईस मिनिट निकालने होंगे।
ये तो आप जानते ही हैं कि 'कॉफी-हाउस' की कहानियों को डाउनलोड किया जा सकता है।
पिछले कुछ सप्ताहों से हम जब मुमकिन हो दो लिंक दे रहे हैं।
अगर डाउनलोड में कोई दिक्कत हो तो आप बेहिचक हमसे संपर्क कर सकते हैं।
'कॉफी-हाउस' की कहानियों को आप डाउनलोड करें और उन्हें अपने मोबाइल-फ़ोन, टैबलेट या लैपटॉप वग़ैरह के ज़रिये अपने प्रियजनों तक पहुंचाए--ये बहुत आवश्यक है। ताकि हम अपने घरों में कहानियों को पढ़ने के साथ-साथ सुनने का सिलसिला भी शुरू कर सकें।
महादेवी वर्मा की रचना--'गिल्लू' भीष्म साहनी की कहानी--'चीफ़ की दावत' मन्नू भंडारी की कहानी-'सयानी बुआ' एंतोन चेखव की कहानी- 'एक छोटा-सा मज़ाक़' सियाराम शरण गुप्त की कहानी-- 'काकी' हरिशंकर परसाई की रचना--'चिरऊ महाराज' सुधा अरोड़ा की कहानी--'एक औरत तीन बटा चार' सत्यजीत रे की कहानी--'सहपाठी'
जयशंकर प्रसाद की कहानी--'ममता' दो बाल कहानियां--बड़े भैया के स्वर में
इन सभी कहानियों को डाउनलोड किया जा सकता है। 'कॉफी-हाउस' पर हम आपकी प्रतिक्रियाओं और आपके सुझावों का सदैव इंतज़ार करते हैं। मिलते हैं अगले रविवार।
रेडियोसखी ममता सिंह. विविध-भारती सेवा में उद्घोषिका एवं पत्रकार। विभिन्न पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। कहानी संग्रह 'राग मारवा' हाल ही में राजपाल प्रकाशन से आया है।
यूनुस ख़ान. उद्घोषक। संगीत पर केंद्रित ब्लॉग रेडियोवाणी और रेडियो पर केंद्रित ब्लॉग रेडियोनामा।
जादू. जादू का पिटारा। मां-पापा की आंखों का तारा। उम्र खेलने-कूदने की। शग़ल कहानी कहने का।